Monday, June 27, 2022
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Bhojpuri में पढ़ें- भगवान जगन्नाथ जी के ‘बेमार’ परला के रहस्य


त ए हिसाब से आषाढ़ के अंजोरिया के दूज शुरू होता 30 जून के सबेरे दस बजके 49 मिनट से आ खतम होता एक जुलाई के दुपहरिया में एक बज के बजकर 09 मिनट पर. त एबेरी जगन्नाथ रथ यात्रा एक जुलाई के शुक का दिने परता. जेठ के महीना में स्नान पूर्णिमा के दिने भगवान के 108 घड़ा से स्नान करावल जाला. ओह दिन भगवान जगन्नाथ “बेमार” परि जाले. उनकर आम आदमी नियर इलाज कइल जाला आ उनका के दवाई के रुप में काढ़ा, फल के रस आ दवाई के रूप में जड़ी- बूटी भोग लगावल जाला. भगवान जगन्नाथ पूर्णिमा के दिन से 15 दिन ले आराम करेले. एही से भगवान जगन्नाथ जी के मंदिर के कपाट 15 दिन तक ले बंद रहेला. जब भगवान नीमन हो जाले त अपना भक्त लोगन से मिले खातिर रथ पर सवार होके आवेले. एही के रथयात्रा कहल जाला.

अब आईं रोचक कथा पर. एह कथा के बड़ा गहिर अर्थ बा. बहुते पुरान समय के बात ह, पुरी में भगवान जगन्नाथ के एगो बहुत उच्चकोटि के भक्त रहले माधवदास. उनका संसार से कौनो मतलब ना रहे. ऊ दिन- रात जगन्नाथ जी के भक्ति में डूबल रहसु. उनहीं के सेवा, नाम- जप आ भक्ति. स्नान पूर्णिमा के ऊहे पहिला जल देसु. एक बेर स्नान पूर्णिमा के समय उनका अतिसार रोग हो गइल. खूब पाखाना होखे लागल आ जर हो गइल. खूब दवाई कइले बाकिर रोग सुनबे ना करे. पाखाना रुकबे ना करे आ जर से देह जरे लागल. अब उनका उठहूं के सर ना रहे. खटिये पर पाखाना के नौबत आ गइल. तब कृपा के सागर भगवान जगन्नाथ खुद उनका कमरा में गइले आ उनकर दशा देख के उनकर सेवा करे लगले. भगवान के सेवा से माधवदास स्वस्थ होखे लगले. देह में तनी जोर अइला का बाद ऊ फट दे चिन्हि लिहले कि ई त भक्त वत्सल भगवान जगन्नाथ जी हमार सेवा करतारे. माधवदास, भगवान के गोड़ पर गिर गइले आ कहले- “प्रभु, रउरा त हमार रोग एक सेकेंड से भी कम समय में खतम क सकेनी. तब ई सेवा के कष्ट काहें उठवनीं हं?” त भगवान कहले कि माधवदास, ई तोहार प्रारब्ध रहल ह. तोहरा ई रोग भोगहीं के परी. अब तोहार शरीर कष्ट 15 दिन के अउरी बा. त तोहार रोग हम अपना पर लेतानी. तूं आज से स्वस्थ बाड़. सचहूं माधवदास स्वस्थ आ पहिले नियर खाए- पीए लगले. आ भगवान माधवदास के रोग लेके एकांतवास में चलि गइले.

एह कथा के सार ईहे बा कि हमनी के जौन कर्म करतानी जा भा कइले बानी जा ऊ तब तक ले पीछा करत रही जब तक ले ओकर फल हमनी के ना मिल जाई. जब भक्त के कष्ट होला त भगवानो के कष्ट होला. भगवान के ई कथा हमनी के समझे खातिर बा. ना त जे अनंत कोटि ब्रह्मांड के मालिक बा ऊ बेमार कइसे परि सकेला. जेकरा एक इशारा पर पूरा ब्रह्मांड नाचता, ऊ एगो शरीर में आबद्ध कइसे रहि सकेला आ ओकरा रोग- ब्याधि से का धराई- छुआई बा. जेकरा तनकी भर इच्छा से अनंत बेमारी क्षन भर में हमेशा खातिर खतम हो सकेली सन, ऊ भला कइसे बेमार परी? भगवान के भक्त वत्सलता के बतावे खातिर ई प्राचीन कथा बिया. त स्पष्ट बा कि हमनी के पौराणिक कथा एक तरह से बोध कथा हई सन. गूढ़ार्थ समुझावे खातिर ऋषि- मुनि लोग सरल- सहज कथा के सहारा लिहल लोग, ताकि साधारण आदमी के भी बात समुझ में आ जाउ. भगवान जगन्नाथ, भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण भगवान हउवन.

पुरी के जगन्नाथ मंदिर के कुछ विशेषता बा जौना के चमत्कार भी मानल जाला. एह मंदिर के विस्तार करीब चार लाख वर्ग फीट एरिया में बा. एकर ऊंचाई 214 फीट बा. दिन में त कौनो बिल्डिंग भा कौनो चीज भा आदमी के परछाईं जमीन पर लउकेला बाकिर जगन्नाथ मंदिर के परछाईं कभी केहू नइखे देखले. जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर जौन झंडा लागल बा, ओकर भी एगो रहस्य बा. ई झंडा हवा के रुख से विपरीत दिशा में लहरात रहेला.  एह मंदिर में काठ के मूर्ति रहेला जौना के हथेली आ पंजा ना रहेला. मंदिर के शिखर पर अष्टधातु से बनल सुदर्शन चक्र रउरा कौनो जगह से देखब त लागी कि ऊ रउरा सामने ही बा. एह चक्र के दर्शन बड़ा शुभ मानल जाला. जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर ना कौनो जहाज उड़ि के जाला आ ना कौनो चिरई- चुरुंग उड़ेला भा बइठेला. एह मंदिर के प्रसाद रोजाना 25 हजार से ज्यादा भक्त खाला लोग. प्रसाद बनावे  खातिर करीब 500 रसोइया आ 300 सहयोगी बा लोग. प्रसाद लकड़ी के चूल्हा पर माटी के हंड़िया में पकावल जाला. ई हंडिया एक के ऊपर एक राखि के बड़ा तकनीक से पकावल जाला. स्वादिष्ट प्रसाद ना कबो घटेला ना बढ़ेला. जगन्नाथ मंदिर समुद्र का लगहीं बा. बाकिर ज्योंही रउरा मंदिर में ढूकबि, समुद्र के गर्जन के आवाज ना सुनाई. मंदिर के मुख्य दरवाजा से ज्योंही रउरा बाहर आइब, समुद्र गर्जन फेर सुनाए लागी.

त जब रथयात्रा के बात चलल त पुरी के जगन्नाथ मंदिर के चमत्कार के बात अइबे करी आ भगवान के प्रति श्रद्धा से सिर झुकिए जाई.

(विनय बिहारी सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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